दादी की पुरानी अलमारी
आस्था एक रोज अपनी दादी की पुरानी अलमारी साफ कर रही थी।
लकड़ी से बनी हुई वो अलमारी समय की धूल से ढकी हुई थी।
दादी के गुजरने के बाद उसने पहली बार उस अलमारी में रखे सामान को छूने की हिम्मत की थी।
जैसे ही अलमारी खुली, उसमें से एक हल्की सी खुशबू बाहर फैली –
ये वही खुशबू थी जो दादी के आंचल से आती थी।
कमरे में एक पल तो सन्नाटा सा भर गया, मानो समय वहीं ठहर गया हो।
अलमारी में उनका चश्मा,एक रूकी हुई घड़ी और एक छोटा सा डिब्बा रखा हुआ था।
डिब्बा हल्का था, लेकिन उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके भीतर कोई अनकही कहानी छिपी हो।
आस्था ने डिब्बा खोलकर देखा। अंदर एक पुरानी डायरी थी –
पीली पड़ चुकी, किनारो से घिसी लेकिन अब भी मजबूती से बंधी हुई थी।
डायरी के पहले पन्ने पर दादी का नाम लिखा था। आस्था समझ गई कि
वह डायरी दादी के युवावस्था की होगी। उसने पन्ने पलटने शुरू किए।
हर पन्ने पर दादी की साफ सुथरी लिखावट, और दिल को छू लेने वाली बातें लिखी हुई थी।
पढ़ते-पढ़ते आस्था अपने दादी का एक नया रूप जान रही थी –
उसकी दादी युवावस्था में एक सपनों वाली लड़की जो जिंदगी को जी भरकर जीती थी।
पन्ने आगे बढ़े तो अचानक एक चिट्ठी जैसा पन्ना मिला, जो अधूरा था। उस पर बस इतना लिखा था –
‘‘अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो समझ लेना कि मैं तुम्हारे सपने पर भरोसा करती हूँ।‘‘
आस्था सोच में पड़ गई। यह किसके लिए लिखा है? और क्यों अधूरा है?
दादी तो कभी कोई बात अधूरी नहीं छोड़ती थीं, तो फिर ये चिट्ठी क्यों रूक गई?
वो शब्द ने उसके मन में एक अजीब सी गरमाहट भर दी थी।
ऐसा लगा मानों ये चिट्ठी उसी के लिए लिखी गई हो।
जागता हुआ हौसला
उसे याद आया – पिता अक्सर कहते थे कि
आस्था बहुत काम बहुत सोच-विचार कर करती है,और उसी सोच में कई मौके निकल जाते है।
उसने चिट्ठी को फिर पढ़ा।
‘‘मैं तुम्हारे सपनों पर भरोसा करती हँ।‘‘
इन शब्दों में दादी की आवाज जैसे उसके आसपास गँजने लगी।
दादी अक्सर कहा करती थीं –
‘‘आस्था, इंसान का डर ही उसके सपनों के बीच सबसे बड़ा पत्थर होता है।‘‘
आज ये बात आस्था को और अच्छे तरह से समझ आ रही थी।
कॉलेज का आखिरी साल चल रहा था और उसे एक बड़ी कंपनी में इंटरव्यू का मौका मिला था।
लेकिन वह हिचक रही थी। उसे लगता था कि वो इतनी योग्य नहीं है।
पर दादी की चिट्ठी अपने बैग में रखकर गई। जैसे वो चिट्ठी उसकी रक्षा कर रही हो।
इंटरव्यू के दौरान उसे पूछा गया –
‘‘आपके लिए सफलता क्या है?‘‘
आस्था ने बिना रूके जवाब दिया –
‘‘जब आपके पास खोने को कुछ न हो और पापने की उम्मीद फिर भी बाकी हो – वही सफलता है।‘‘
इंटरव्यू लेने वालों ने मुस्कुराकर उसकी बात पे सहमति दी। उसके शब्द सच्चे और अनुभव से भरे थे।
एक विक बाद ईमेल आया –
आस्था चयनित हो चुकी थी। उसने डायरी का आखिरी पन्ना निकाला और छोटे अक्षरो में लिखा –
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‘‘दादी, आपका विश्वास मुझे मेरी मंजिल तक ले गया।‘‘
दादी की अधूरी चिट्ठी उसके जीवन की सबसे सुंदर और संपूर्ण कहानी बन गई थी।
निष्कर्ष
- कभी- कभी एक अधूरी चिट्ठी जिंदगी की सबसे पूरी सीख बन जाती है।
- कुछ शब्द उग्र भर नहीं भुलाये जाते और यही शब्द इंसान को मंजिल तक ले जाते हैं।
- हर दिल में एक अधूरी चिट्ठी होती हैं…. फर्क बस इतना है कि कौन पढ़ने की हिम्मत करताहै।
- सच यह है आस्था नहीं बदली -दादी का भरोसा उसमें फिर से जाग गया।
- शायद यही जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य है – हिम्मत लिखी नहीं जाती, जगा दी जाती है।
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