Sunday, February 22, 2026
HomeFamily & Relationshipक्या पैसा सच में सब बदल देता है? Inspirational Love Story

क्या पैसा सच में सब बदल देता है? Inspirational Love Story

ये कहानी है छोटे शहर की धीमी धड़कन।
देवगढ़ कोई बहुत बड़ा शहर नही था।

वहां शाम जल्दी उतर आती थी और लोग एक-दूसरे को नाम से जानते थे।
चाय की दुकानों पर राजनीति से लेकर रिश्तो तक हर बात की चर्चा होती थी।

इसी देवगढ़ मे रहता था निवान शुक्ला।
उसकी दुनिया बहुत सीमित थी –
घर, पिता की स्टेशनरी की दुकान, मां की दवाइयां और
उसकी परीक्षाओ की किताबे।

वह महत्वकांक्षी था लेकिन दिखावे वाला नही।

उसी शहर मे रहती थी तृषा मेहरा।
जो सरकारी कॉलेज मे पढ़ती थी।
तृषा के अंदर बेचैनी थी।

वह अक्सर कहती , इस शहर की हवा अच्छी है,
पर सपनो के लिए जगह छोटी है।

वह पत्रकार बनना चाहती थी।
उसे सच लिखना था,
सवाल पूछने थे और
अपने शहर से बाहर निकलना था।

दोनो एक ही शहर मे रहते थे लेकिन
उनकी सोच की दिशाएं अलग थी।

लाइब्रेरी की खामोश शुरूआत

कॉलेज की लाइब्रेरी मे दोपहर का सन्नाटा था।
खिड़कियो से आती धूप किताबों पर पड़ रही थी।

निवान किताब मे डूबा था, सामने की कुर्सी खाली थी।
तभी तृषा आई और बैठ गई।

कुछ मिनटो बाद उसने धीरे से पूछा –
‘‘ये किताब खत्म कर ली? मुझे भी चाहिए।‘‘
निवान ने किताब उसकी तरफ बढ़ा दी।

बस इतना ही लेकिन अगले दिन फिर वही सीट,
वही चुप्पी, वही साझा किताबे।
धीरे-धीरे चुप्पी बातो मे बदली।

दोस्ती जो सुकून बन गई

तृषा को निवान मे स्थिरता मिलती थी।
निवान को तृषा मेे ऊर्जा।
एक दिन तृषा कैटिन मे बोली –
‘‘तू कभी शहर छोड़ने के बारे मे नही सोचता।‘‘

निवान मुस्कुराया –
‘‘मेरे सपने यही पूरे होंगे।‘‘
‘‘मेरे नही‘‘ तृषा ने साफ कहा।

वही पहला संकेत था कि उनकी मंजिले अलग हो सकती है।
लेकिन दस समय प्यार नही दोस्ती मजबूत थी।

प्यार की असली शुरूआत

यह कहानी अचानक हुए इजहार की नही है।
यह प्यार समझ से पैदा हुआ।
एक शाम दोनो शहर की पुरानी झील के किनारे बैठे थे हवा हल्की थी।

तृषा ने अचानक पूछा –
‘‘मै यहां से चली गई तो?‘‘
निवान ने बिना सोचे कहा –
‘‘तो मै यही रहकर तेरी खबरे पढ़ूगा।‘‘

तृषा ने उसकी तरफ देखा।
तू मुझे रोकेगा नही?
अगर रोका तो तेरे सपनो से प्यार नही करूंगा।

उस दिन दोनो को समझ आया –
वे एक-दूसरे से अलग नही रह पाऐंगे।

पहला इजहार बिना वादो के
बारीश की एक शाम।
झील के किनारे भीगते हुए तृषा ने कहा –
‘‘मुझे लगता है तू मेरी जिंदगी का सबसे सुकून वाला हिस्सा है।‘‘

निवान ने गहरी सांस ली।
मुझे तुझसे प्यार है।
कोई बड़ा वादा नही।
कोई कसमे नही।

बस सच्चाई।
लेकिन उसी रात दोनो ने अपने-अपने डर महसूस किए।

तृषा को डर था-
कही उसे ये रिश्ता रोक न दे।
निवान को डर था –
कहीं ये रिश्ता उससे छूट न जाए।

कहानी का नया मोड़

कुछ महीनो बाद तृषा को दिल्ली की एक बड़ी मीडिया से ऑफर मिला।
वह खुशी से रो पड़ी।
निवान ने गले लगाकर कहा –
तू इसके लिए बनी है।

उसे पता था –
यह दूरी आसान नही होगी।
स्टेशन पर विदाई के समय दोनो शांत थे।
ट्रेन चलने लगी।

तृषा ने खिड़की से हाथ बाहर निकाला।
निवान ने पकड़ लिया।
खुद को मत बदलना, उसने कहा।
और तू खुद को मत रोकना, तृषा ने जवाब दिया।

प्यार की असली परीक्षा

शुरूआत मे सब ठीक था।
रोज कॉल, वीडियो चैट, छोटे-छोटे सरप्राइज।

तृषा दिल्ली की भागती दुनिया मे घुलने लगी।
निवान देवगढ़ की जिम्मेदारियो मे और डूब गया।

धीरे-धीरे समय कम हाने लगा।
एक रात तृषा ने कहा-
यहां के लोग बड़े सपने देखते है। मै भी देख रही हूं।

निवान ने सिर्फ सुना।
‘‘अगर मै यहां बस गई तो?‘‘
वही सवाल जो कभी मजाक मे था, अब गंभीर था।

जिम्मेदारियां बनाम महत्वकांक्षा

उसी दौरान निवान के पिता की तबीयत बिगड़ गई।
दुकान की पूरी जिम्मेदारी उस पर आ गई।
वह दिल्ली नही जा सकता था।
एक लंबी बातचीत के बाद तृषा ने कहा –

‘‘हम एक-दूसरे से प्यार करते है….
लेकिन शायद हमारी जिंदगी की दिशा अलग है।‘‘
निवान चुप रहा।

फिर बोला-
‘‘मै तुझे रोकूंगा नही।‘‘
उस रात दोनो रोए।
लेकिन किसी ने किसी को दोष नही दिया।

यह ब्रेकअप नही था।
यह एक परिपक फैसला था।

समय की दूरी

दो साल बीत गए।
निवान ने बैंक की नौकरी हासिल कर ली।
घर की हालात सुधर गई।

तृषा अब एक बड़े न्यूज चैनल मे रिपोर्टर थी।
एक दिन निवान ने टीवी पर उसका इंटरव्यू देखा।

उसने मैसेज भेजा-
तू सच मे कमाल है।
जवाब आया-
तू हमेशा मेरी ताकत रहेगा।
बस इतना ही।

पांच साल बाद अचानक सामना

एक राष्ट्रीय कार्यक्रम मे दोनो की मुलाकात हो गई।
न कोई झिझक।
न कोई शिकायत।
बस एक शांत मुस्कान।

कैसी है?
अच्छी हू। तू?

कुछ देर बाद तृषा बोली –
‘‘अगर उस समय मे रूक जाती तो शायद मै ये नही बनती।‘‘

निवान ने कहा-
‘‘और मै चला जाता तो शायद अपने घर को संभाल नही पाता।‘‘
दोनो ने महसूस किया-
वे गलत नही थे।
बस समय अलग था।

समय बदल चुका था।
दोनो अपने पैरो पर खड़े थे।

निवान बैंक मे अधिकारी बन चुका था।
तृषा देश की जानीमानी पत्रकार थी।

एक रात तृषा ने कहा –
निवान, क्या कभी तुझे लगा कि
हमने जल्दी हार मान ली थी?

निवान कुछ देर तक चुप रहा।
हार नही…. हमने उस समय सही चुना था।
लेकिन शायद आज हम और मजबूत है।
बात यही से बदली।

परिवार की दीवार

जब बात आगे बढ़ी तो असली परीक्षा शुरू हुई – परिवार।
निवान के घर मे सोच थी कि
लड़की इतनी बड़ी पत्रकार है….
दिल्ली मे रहती है…
हमारे छोटे शहर मे कैसे ढलेगी?

उधर तृषा के घर मे भी सवाल थे –
देवगढ़? फिर वही छोटा शहर?
तुमने कितनी मेहनत से ये पहचान बनाई है।

एक दिन तृषा ने साफ कहा –
मै किसी शहर के लिए नही, इसान के लिए समझौता करूंगी।
पर समाज इतना सरल नही होता।

रिश्तेदार फुसफुसाने लगे।
पैसे और नाम के बाद पुराना प्यार याद आ गया।
यह बात दोनो को चुभी।

जब पैसे की ताकत सामने आई

इसी बीच तृषा को एक बड़ा ऑफर मिला।
पैकेज करोड़ो मे था।
शर्त विदेश मे बसना।

मीडिया मे खबर फैली।
अब वही लोग जो सवाल कर रहे थे, कहने लगे –
ऐसी बहू मिले तो परिवार की किस्मत बदल जाए।
निवान के पिता भी चुप हो गए।

समाज सच मे अजीब है –
जहां पहले सपनो पर सवाल थे, अब पैसो पर सम्मान था।

निवान ने एक रात तृषा से कहा-
देखा? दुनिया सच मे पैसे से बदल जाती है।

तृषा मुस्कुराई –
हां लेकिन मेरा फैसला अब भी दिल से होगा।

सबसे बड़ा संघर्ष

तृषा ने विदेश का ऑफर ठुकरा दिया।
पूरा घर हिल गया।
उधर निवान ने भी बड़ा फैसला लिया।

उसने देवगढ़ मे बैंक की नौकरी छोड़कर,
दिल्ली ट्रांसफर के लिए आवेदन किया।
और साथ ही पिता की दुकान को ऑनलाइन प्लेटफार्म पर ले गया।

कुछ ही महीनो मे दुकान का व्यापार दोगुना हो गया।
पैसा आने लगा। घर की सोच बदलने लगी।
निवान के पिता पहली बार बोले-
शायद हमने सपनो को छोटा समझ लिया था।

एक साल बाद दोनो की शादी हुई – बिना किसी शोर, बिना दिखावे।
इस बार स्टेशन पर विदाई नही थी।
दोनो साथ खड़े थे।
तृषा ने धीमे से कहा –
अगर उस दिन तू मुझे रोक लेता तो?

निवान मुस्कुराया –
तो तू मुझसे नफरत करती।
अगर तू चली न जाती, तो
शायद आज मै इतना मजबूत न बना होता।

दोनो समझ चुके थे –
पैसा दुनिया बदल सकता है,
पर रिश्ता तभी टिकता है
जब दो लोग खुद को बदले बिना साथ चलना सीख ले।

देवगढ़ अब छोटा नही लगा।
दिल्ली अब डरावनी नही लगी।
क्योकि जगह नही,
साथ मायने रखता है।

और सच यही था –
उनकी कहानी अधूरी नही थी।
वो बस सही समय का इंतजार कर रही थी।

Readers Message/ Questions

कभी-कभी प्यार गलत नही होता,
बस समय गलत होता है।
सपनो और जिम्मेदारी के बीच चुनाव आसान नही होता।

लेकिन जब दो लोग एक-दूसरे की उड़ान को रोकने के बजाय,
उसे सहारा देते है।
तो कहानी अधूरी नही रहती।
वो बस देर से पूरी होती है।

याद रखिए –
पैसा दुनिया की नजर बदल सकता है,
लेकिन इंसान की नीयत और सच्चा प्यार ही जिंदगी बदलता है।

अब आपसे एक सवाल…..

  1. अगर आप तृषा की जगह होते तो क्या आप अपने सपनो के लिए शहर छोड़ देते?
  2. अगर आप निवान की जगह होते, तो क्या आप इंतजार करते या आगे बढ़ जाते?
  3. क्या सच मे पैसा आने के बाद ही समाज का व्यवहार बदलता है?
  4. क्या सही समय पर लिया गया ‘‘दूरी का फैसला‘‘ भी प्यार का हिस्सा हो सकता है?

कमेंट मे बताए –

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ हो, तो इसे शेयर करे।
क्योकि शायद कोई आज इसी मोड़ पर खड़ा हो…
जहां उसे समझने की जरूरत है, जज करने की नहीं।

कुछ अन्य कहानियाँ –

our website – www.chandaal.com

you tube channel – chandaalstory

instagram – @isha.vibe143



shivani chaudhari
shivani chaudharihttp://chandaal.com
मैं शिवानी चौधरी इस वेबसाइट की Author हूँ। यहाँ मैं प्यार, रिश्तों और जीवन की सच्चाइयों पर ऐसी कहानियाँ लिखती हूँ जो दिल को सीधे छू जाती हैं। सरल शब्द, गहरी भावनाएँ — यही Chandaal.com की पहचान है। यहाँ कहानियाँ सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं… महसूस की जाती हैं। Chandaal.com का उद्देश्य है— ऐसी कहानियाँ देना जो सरल हों, सच्ची हों और दिल तक पहुँच जाएँ।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments