जब घर मे दीवार नही था।
पुराने शहर की एक तंग सी गली मे एक साधारण सा घर था।
घर बहुत बड़ा नही था, लेकिन उसमें रहने वाले
लोगो के दिल बहुत विशाल था।
इस घर मे रहते थे –
विराज उनकी पत्नी अन्वी,
बेटा करण, बेटी सिया।
यह कोई फिल्मी परिवार नही था।
न बहुत अमीर, न बहुत गरीब।
बस इतना था कि महीने के आखिरी
हफते मे खर्च गिनकर चलता था।
विराज एक प्राइवेट कंपनी मे अकाउंन्ट्स संभालते थे।
अन्वी स्कूल में हिन्दी पढ़ाती थी।
करण कॉलेज में था और सिया दसवी में।
बाहर देखने पर सब समान्य लगता था,
लेकिन हर परिवार की तरह इस घर के अंदर भी अनकही कहानियां थी।
परिवार का असली मतलब
विराज का मानना था –
‘‘परिवार वो नही जो सिर्फ साथ खड़ा रहता है,
परिवार वो है जो मुश्किल मे भी साथ खड़ा रहे।‘‘
लेकिन जिंदगी हर किसी की परीक्षा लेती है।
विराज की नौकरी अचानक चली गई।
एक दिन ऑफिस से लौटते वक्त उनका चेहरा उतरा हुआ था।
अन्वी ने बिना सवाल किए खाना परोस दिया।
खाने के बाद जब बच्चे अपने कमरो मे चले गए,
विराज ने धीरे से कहा –
अन्वी मेरी नौकरी चली गई।
अन्वी एक पल के लिए चुप रही ।
फिर मुस्कुराई और बोली –
‘‘तो क्या हुआ?
नौकरी गई है, तुम नही गए।‘‘
यही वो पल था जहां से कहानी बदली।
जब रिश्ते बोझ नही ताकत बने
अगले कुछ महीने कठिन गए।
घर का बजट बिगड़ा।
सिया की ट्यूशन छुड़ानी पड़ी।
करण ने कॉलेज के साथ पार्ट टाइम काम शुरू किया।
एक दिन करण बोला –
पापा अब मै आपकी मदद करूगा।
आपने हमे कभी अकेला नही छोड़ा,
अब हमारी बारी है।
विराज की आंखे भर आयी।
यही वो पल था जहा एक पिता ने जाना कि
बच्चे सिर्फ जिम्मेदारी नही,
कभी-कभी सहारा भी बनते है।
अन्वी – एक पत्नी,एक स्तंभ
अन्वी ने कभी शिकायत नही की।
सुबह स्कूल, दोपहर घर शाम को बच्चो की पढ़ाई।
वो अक्सर कहती –
‘‘रिश्ते तभी टूटते है
जब हम एक-दूसरे को सुनना बंद कर देते है।‘‘
विराज कई बार टूट जाते,
लेकिन अन्वी उन्हे बखरने नही देती।
समाज का दबाव और रिश्तो की परीक्षा
पड़ोस मे बाते शुरू हो गई।
सुना है विराज की नौकरी चली गई।
अब कैसे चलेगा घर?
बच्चो का भविष्य क्या होगा ?
एक दिन किसी ने अन्वी से कह दिया –
आप चाहे तो अपने मायके चले जाए।
अन्वी मुस्कुराई और बोली –
‘‘मायके तो वो होता है
जहा अपना इंसान हो और
वो इंसान मेरा पति है।‘‘
यहा से साफ था –
यह रिश्ता सिर्फ शादी नही था,
यह साझेदारी थी।
करण का संघर्ष
करण का पार्ट टाइम काम आसान नही था।
दिन मे कॉलेज, शाम को काम,
रात मे थकान।
कभी-कभी वो चिड़चिड़ा हो जाता।
एक रात उसने कहा –
मुझे भी अपने दोस्तो की तरह आजादी चाहिए।
विराज ने गुस्से की जगह शांति चुनी।
‘‘बेटा,
आजादी का मतलब जिम्मेदारी से भागना नही होता।
आजादी वो है,
जहा तुम अपने परिवार के लिए खड़े रह सको।‘‘
करण उस रात देर तक सोचता रहा।
सिया की खामोशी
सिया कम बोलने लगी थी।
एक दिन अन्वी ने पूछा-
क्या बात है?
रो पड़ी सिया ।
मम्मी मुझे लगता है मै बोझ हू।
मेरी वजह से खर्च बढ़ता है।
अन्वी ने उसे गले लगा लिया।
‘‘बच्चे कभी बोझ नही होते।
वो तो भगवान की सबसे खूबसूरत जिम्मेदारी होते है।‘‘
उस दिन सिया ने पहली बार समझा कि
परिवार मे उसकी क्या जगह है।
संघर्ष से उम्मीद तक
छह महीने बाद
विराज को एक छोटी सी नोकरी मिली।
पगार कम थी लेकिन
आत्मसम्मान लौटा।
घर मे फिर से चाय की खूशबू आई।
हंसी वापस लौटी।
विराज ने कहा –
‘‘शायद भगवान हमे यह सिखाना चाहता था कि
पैसे से पहले रिश्ते जरूरी है।‘‘
अन्वी ने सिर हिलाया।
एक नई शुरूआत
करण ने अपनी पढ़ाई के साथ
डिजिटल मार्केटिंग सीखनी शुरू की।
सिया ने स्कालरशिप परीक्षा दी।
अन्वी ने आनलाइन ट्यूशन शुरू कर दी।
यह घर अब सिर्फ बचा नही,
बल्कि आगे बढ़ने लगी।
परिवार का असली सबक
एक दिन सब छत पर बैठे थे।
करण बोला –
अगर वो बुरा वक्त नही आता,
तो शायद हम इतने करीब नही आते।
विराज ने कहा –
‘‘मुसीबते रिश्ते तोड़ते नही,
वो दिखाती है कि रिश्ता कितना मजबूत है।
आज का विराज परिवार
आज विराज खुद की छोटी अकाउंटिंग फर्म चलाते है।
अन्वी एक सम्मानित टीचर है।
काव्य आत्मनिर्भर है।
सिया अपने सपनो के पीछे चल रही है।
शाम का समय था और हवा मे एक अजीब सी सुकून भरी ठंडक थी।
सिया रेलिंग के पास खड़े होकर बोली –
पापा अगर फिर से ऐसा वक्त आया तो….?
विराज ने उसकी बात बीच मे ही रोक दी।
‘‘तो हम फिर से साथ रहेगे।‘‘
यह जवाब बहुत साधारण था,
लेकिन उसमे भरोसे की पूरी दुनिया छुपी थी।
समाज से आगे निकलता परिवार
अगले कुछ महीनो मे हालात धीरे-धीरे बेहतर होने लगे।
पैसे की तंगी अभी पूरी तरह खत्म नही हुई थी,
लेकिन मन की घूटन कम हो गई थी।
पड़ोसियो की बाते भी बदलने लगी।
अब वही लोग कहने लगे –
देखो, कैसे सब संभाल लिया।
अन्वी मन ही मन सोचती –
लोग वक्त के साथ बदल जाते है,
लेकिन परिवार वही होता है।
करण का बदलता नजरिया
करण अब पहले जैसा नही रहा था।
काम ने उसे जिम्मेदार बना दिया था।
वो समझ चुका था-
आजादी सिर्फ मनमानी करना नही होती,
आजादी वो होती है जब आप अपने
फैसलो से किसी और का बोझ हल्का कर सके।
सिया का आत्मविश्वास
स्कालरशिप का रिजल्ट आया।
सिया पास हो गई थी।
जब उसने रिजल्ट दिखाया तो
अन्वी की आंखो मे आंसू आ गए।
अन्वी ने कहा –
देखा मेने कहा था ना….
तुम बोझ नही हो,
तुम ताकत हो।
उस दिन सिया ने पहली बार
खुद को कमजोर नही,
बल्कि जरूरी महसूस किया।
एक रविवार को बिजली चली गई।
मोबाइल चार्ज नही थे,
टीवी बंद था।
उस अंधेरे मे मोमबत्ती की लौ छोटी थी,
लेकिन घर रोशन लग रहा था।
जो हम अक्सर भूल जाते है
आज के समय मे
हर कोई आगे बढ़ने की दौर मे है।
बेहतर नौकरी, बेहतर घर, बेहतर जिंदगी।
लेकिन हम अक्सर भूल जाते है –
अगर घर के लोग ही पीछे छूट जाए,
तो आगे बढ़ने का मतलब ही क्या रह जाता है?
विराज का परिवार परफेक्ट नही था,
लेकिन सच्चा था।
शायद यही काफी था।
आखिरी सच्चाई
कुछ साल बाद करण अच्छी नौकरी
मे लग गया।
सिया ने अपने सपनो की पढ़ाइ शुरू की।
अन्वी की आनलाइन क्लासेस चल पड़ी।
विराज भी अपने काम मे स्थिर हो गए।
लेकिन सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि
उनका परिवार आज भी एक-दूसरे के साथ खड़ा है।
Life Lesson
- परिवार मे पैसा जरूरी है लकिन भरोसा उससे भी ज्यादा जरूरी है।
- रिश्ते जब मजबूत होते है जब एक-दूसरे को सुना जाए।
- मुश्किल समय रिश्तो की असली पहचान कराता है।
- बच्चे सिर्फ जिम्मेदारी नही साथी भी बन सकते है।
अगर आज आपके परिवार मे मतभेद है,
तो एक बार रूककर सोचिए –
क्या आप सही साबित होना चाहते है
या रिश्ता बचाना?
क्योकि रिश्ते जीतने से नही,
निभाने से खूबसूरत होते है।
आपसे एक सवाल
क्या आपने कभी अपने परिवार के लिए कोई बड़ा त्याग किया है?
मुश्किल समय मे आपके परिवार ने आपका साथ दिया या नही?
नीचे कमेंट में जरूर बताइए –
आपकी कहानी किसी और को हिम्मत दे सकती है।
आपको ये कहानी “रिश्तो का सुकून| Heart Touching Hindi Story” कैसी लगी?
क्या आपने भी अपने जीवन मे रिश्तो का ऐसा सुकून महसूस किया है?
कमेंट मे अपनी राय जरूर साझा करे।
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