Tuesday, April 21, 2026
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खामोशी के पीछे छुपी चीख | Struggle And Success Story

सुमन सिर्फ 8 साल की थी, जब उसके पापा काम के बहाने विदेश चले गए।
उन्होंने वादा किया था – हर महीने पैसे भेजेंगे,
लेकिन वादे भी कभी – कभी लोगों की तरह रास्ते में खो जाते हैं।

शुरूआत दर्द की पर उम्मीद की

घर में माँ आशा और छोटी सी सुमन। मुश्किलें गरीबी दूसरों की बातें
ये सब उसकी रोज की रोटी की तरह था – कड़वा,
लेकिन नजरअंदाज करना सीख लिया था।
माँ घर – घर खाना बनाती और रात को थक्कर
सुमन को सीने से लगाकर कहती –
‘‘बेटी तू पढ़ लिखकर कुछ बन जाना
ताकि कोई तेरे सपनों की कीमत न लगाए।‘‘

सुमन हर रात सोचती –
पापा कब आऐंगे ?
पर जवाब हमेशा ही उसे खामोश दीवारें देती।

अब सुमन बड़ी हुई,
पर भूख, ताने, अकेलापन – सब बचपन के जैसे ही थे।

स्कूल में बच्चे कहते है –
‘‘तेरे पापा क्यों नहीं आते ?‘‘
सुमन मुस्कुराकर कहती –
‘‘वो बहुत व्यस्त हैं एक दिन आऐंगे।‘‘
और फिर बाथरूम में छिपकर रो लेती थी।

माँ कभी टूटती नहीं थी
पर तकिए में रात को चेहरा छुपाकर वो भी खामोशी से आँसू बहाती।

पैसों की कमी ने आशा की सेहत भी छीन ली।
दवाइयां मँहगी थीं पर हिम्मत उससे भी मँहगी।
माँ ने कभी सुमन को बोझ नहीं कहा
बल्कि बोलती कि –
‘‘तू मेरी जीत है बेटी, हार नहीं।‘‘

अब कॉलेज का समय आया
सुमन ने अब पार्ट टाइम जॉब शुरू की –
ट्यूशन, आनलाईन वर्क, दुकान में मदद
जहाँ मौका मिला, काम किया।

बेटी ने संभाली दुनिया

हर महीने सैलरी का आधा माँ की दवाइयों में,
बाकी घर चलाने में जाता।
उसके पास खुद के लिए सपने भी उधार के थे।

लोग कहते –
‘‘बिना बाप की बच्ची क्या करेगी?‘‘
और सुमन सोचती –
‘‘बिना बाप के ही तो सब करके दिखाना है।‘‘

धीरे – धीरे उसके सपनों को पंख मिले।
एक अच्छी कंपनी में जॉब, स्टेबल लाइफ
सब कुछ सही होने लगा।

और वो दिन जब पापा लौट आए

एक दिन अचानक से दरवाजे में खट – खटाने की आवाज आई।
दरवाजा जोर से खोला और जब सुमन ने देखा,
उस आदमी को तो वो सॉक रह गई।
वो आदमी सुमन के पापा थे।

और आते ही उन्होंने उनका हाल चाल नहीं पूछा।
सीधे सवाल किया और उनके सवाल पे,
चेहरे पर गुस्सा, आँखों में शक,
और वो कहते है –

ये सब किसके पैसे से?
इतना सब कैसे कर लिया?
कहीं गलत काम तो नहीं?

ये सब से सुमन का कलेजा फट गया।
जिस इंसान के इंतजार में बचपन गुजरा,
उसने 20 साल बाद लौट कर हमें इज्जत का तमाचा मार रहा है।
ये सब सुनकर सुमन और उसकी माँ को बहुत गुस्सा आया।

माँ ने धीरे से कहा!
‘‘ये सब मेरी बेटी ने किया है।
मेहनत से अपने दम पर ।‘‘

पर पापा बोले!

‘‘मैं इस घर का मुखिया हूँ,
सब कुछ मेरे पैसे से होगा।‘‘

वो आदमी
जो कभी कमाया ही नहीं
वो आज हुक्म चलाने आया था!

अब बेटी चुप नहीं थी

सुमन आगे बढ़ी, आँखों में वर्षो का दर्द,

‘‘पापा
घर पर रखा हर दाना मैनें कमाया है,
माँ की दवा मैंने खरीदी है
और आपकी हर कमी मैंने पूरी की है।‘‘

पापा तमतमाए –
‘‘तुम मुझे जवाब दोगी?‘
सुमन शांत आवाज में बोली –

‘‘हाँ! क्योंकि आपने हमें छोड़ा है
और हमने खुद को संभाला है।‘‘

इतने सालों की खामोशी आज शब्द बनकर फूट पड़ी थी।
माँ ने कांपते हुए हाथों से बेटी का हाथ पकड़ा –
‘‘बेटा चिल्लाओ मत।‘‘

सुमन ने माँ को गले लगाया –

‘‘अब हम किसी पर निर्भर नहीं
आप मेरी ताकत हैं माँ,
और मैं आपका सहारा।‘‘

पापा चुप
पहली बार उन्हें शर्म आई।

रिश्ते खून से नहीं, निभाने से बनते हैं

सुमन ने पापा को देखते हुए कहा –

‘‘पापा आपको रहना है, तो इज्जत से
वरना हमारे लिए ये दुनिया पर्याप्त है
जिसमें आपने कभी जगह बनाने की कोशिश नहीं की।‘‘

पापा के आँसू निकल आए।
उन्होंने माँ के पैर पकड़ लिए,
मुझे माफ कर दो मैं गलत था।

माँ रो पड़ी
सुमन के कंधे पर सिर रखकर कहा –
‘‘बेटी तू मेरी जीत है। तूने खुद को साबित कर दिया।‘‘

उस दिन बेटी ने सिर्फ घर नहीं,
अपनी पहचान बचाई।

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निष्कर्ष

  • पिता बनने से कोई आदमी पिता नही बन जाता।
  • जो अपनाए, साथ दे, वही परिवार कहलाता है।
  • माँ – बेटी का रिश्ता दुनिया की सबसे मजबूत दीवार है।
  • समय पर साथ देने वाला ही अपनों में गिना जाता है।
  • रिश्तें अधिकार से नहीं व्यवहार से चलते हैं।
  • जो दर्द में साथ रहे, उसे ही जिंदगी में जगह मिले।

Massage To Readers

कभी भी खुद को कम मत समझो।
अगर हालात साथ न हों
तो हालात बदल दो।
क्योंकि बिना सहारे उड़ने वालों के पंख
सबसे मजबूत होते हैं।

shivani chaudhari
shivani chaudharihttp://chandaal.com
मैं शिवानी चौधरी इस वेबसाइट की Author हूँ। यहाँ मैं प्यार, रिश्तों और जीवन की सच्चाइयों पर ऐसी कहानियाँ लिखती हूँ जो दिल को सीधे छू जाती हैं। सरल शब्द, गहरी भावनाएँ — यही Chandaal.com की पहचान है। यहाँ कहानियाँ सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं… महसूस की जाती हैं। Chandaal.com का उद्देश्य है— ऐसी कहानियाँ देना जो सरल हों, सच्ची हों और दिल तक पहुँच जाएँ।
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