सुबह की हल्की धूप जैसे ही खिड़की से होती हुई चेहरे पर पड़ी… मेरी आँखें खुल गईं।
आदतन हाथ खुद-ब-खुद फोन की ओर चले गए।
यूँ तो कई मैसेजेस थे, लेकिन उनमें से एक मैसेज ऐसा था जिसने दिल की धड़कनें बढ़ा दीं।
स्क्रीन पर सिर्फ पाँच शब्द थे –
‘‘आप क्यों नहीं आए … ?‘‘
मगर उन पाँच शब्दों में शिकायत भी थी…. इंतजार भी और थोड़ा सा अपनापन भी।
मुझे थोड़ा आश्चर्य भी हुआ और खुशी भी। यही तो संकेत था उसका मेरी ओर आकर्षित होने का।
मेरा नाम रेयान है। जब मैं गार्डन में था तब एक लड़की ने मेरे दिल में दस्तक दी थी, जिसकी कहानी आपको इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से साझा कर रहा हूँ।
ये कहानी है उस लड़की के बारे में जिससे मैं अभी कुछ दिन पहले ही मिला था। वो गार्डन में मेरी बेंच के ठीक दूसरी ओर आकर बैठ गई। लंबे बालों में, धीमी चाल और चेहरे की उस मासूमियत ने मेरा दिल चुरा लिया था।
दोस्त के माध्यम से उससे बात शुरू हुई। थोड़ी देर की बातचीत में नाम पता चला – ‘‘आरोही‘‘ और मोबाइल नंबर भी मिल गया।
इस कहानी का प्रथम भाग – Chapter 1 : प्रारम्भ – Beginning of a Love Story
तब से सूरज डूबने के बाद दिनभर के कामों से थोड़ी फुर्सत निकालकर हम बातें किया करते थे। उसका रोज शाम सब्जी लेने जाना और वापस आकर फोन पर अपने भविष्य को लेकर चिंता जाहिर करना, रोज की बात हो गई थी।
कुछ दिन पहले मुझे निशा का कॉल आया – उसकी बड़ी बहन की शादी थी। उसका गांव मेरे घर से लगभग 100 कि.मी. की दूरी पर था। निशा मेरी कॉलेज टाइम की एक अच्छी दोस्त थी। वो सिर्फ मेरी ही नहीं, आरोही की भी पक्की सहेली थी।
कॉलेज के सभी दोस्तों ने साथ मिलकर उसकी बहन की शादी में जाने का प्लान बनाया। लेकिन मैं यह नहीं जानता था कि आरोही भी आएगी या नहीं।
मैंने तुरंत मैसेज किया – ‘‘आप जा रहे हो क्या निशा के यहाँ‘‘। हम लोग सारे दोस्त तो प्लान बना रहे हैं जाने का।
जैसा कि मुझे उम्मीद था।
आरोही ने कहा – मैं भी आ रही हूँ, मिलते हैं फिर शादी में। इतना सुनते ही मन में बेहद खुशनुमा अनुभव का एहसास हुआ।
काफी समय बाद फिर से मिलने का जो मौका मिल रहा था। कहीं न कहीं वो भी इस दिन को लेकर उत्साहित थी। और मिलने को बेताब भी।
आखिरकार वो दिन भी आया जिस दिन का इंतजार पूरे हफ्ते किया था। लेकिन क्या करें, समय को कुछ और ही मंजूर था।
एक शासकीय कर्मचारी कई जिम्मेदारियों से भी बंधा होता है। उस दिन मैंने भी खुद को ऐसे ही एक काल्पनिक बंधन में बंधा हुआ पाया।
अंततः मेरा जाना कैंसिल हो गया। किन्तु यह बात मैंने उसे नहीं बताई।
‘‘शायद मैं उसे बताकर खुद को जवाबदेह नहीं बनाना चाहता था… या शायद मुझे यकीन था कि वो समझ जाएगी। रिश्ते में सबसे बड़ी गलतफहमी यही होती है कि हम सोचते हैं कि सामने वाला बिना कहे ही सब समझ जाएगा।‘‘
हमारा रिश्ता अब तक तो सिर्फ दोस्ती तक का ही था.. लेकिन शायद वो भी तैयार थी इस रिश्ते को एक और नया नाम देने को।
अगले दिन जैसे ही मेरी आँख खुली तो फोन पर एक मैसेज आया हुआ था – ‘‘आप क्यों नहीं आए, मैं आपका इंतजार कर रही थी।‘‘
क्या सच में? मैंने सोचा, ये मेरा इंतजार कर रही थी!! उस दिन मन ने कहा कि हाँ, वो भी मुझे पसंद करने लगी है।
“उस दिन मुझे अफसोस नहीं हुआ कि मैं शादी में नहीं गया। उल्टा एक अजीब-सी तसल्ली हुई।
किसी ने मेरा इंतजार किया था।
शायद मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं किसी की प्राथमिकता बन चुका हूँ।
और सच कहूँ तो मुझे अच्छा लगा। बहुत अच्छा।”
