शहर छोटा था, पर लोगो की सोच बड़ी – बड़ी दीवारो मे बंटी हुई थी।
वो दोनो एक ही मोहल्ले मे रहते थे, लेकिन कभी एक-दूसरे को जानने की जरूरत महसूस नही हुई।
वो लड़की – शांत, सादगी से भरी, अपने परिवार की जिम्मेदारियों मे उलझी हुई।
वो लड़का – जिम्मेदार, पर थोड़ा अलग सोच वाला, भीड़ मे रहकर भी अकेला।
उनकी दुनिया अलग थी।
सपने अलग थे।
पर किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था।
एक दिन अचानक, बारीश की शाम मे बिजली चली गई।
पूरे मोहल्ले मे अंधेरा छा गया।
उसी अंधेरे मे पहली बार उनकी मुलाकात हुई।
न कोई फिल्मी बेकग्राउण्ड म्यूजिक।
न कोई स्लो मोशन।
बस एक साधारण सा ‘‘माफ कीजिए‘‘ – और वही से कहानी शुरू हुई।
बिना इजहार का रिश्ता
उनके बीच कभी ‘‘आई लव यू‘‘ नही बोला गया।
न कभी गुलाब दिया गया।
न कोई प्रपोजल।
लेकिन कुछ था।
जब लड़की की तबीयत खराब होती,
तो लड़का बिना पूछे दरवाजे पर रख जाता।
जब लड़का परेशान होता,
तो लड़की चुपचाप छोटा सा मैसेज भेज देती – सब ठीक हो जाएगा।
शायद प्यार का असली रूप् यही होता है।
जो शब्दो से नही, एहसासो से समझ आता है।
जब बाते शुरू हुई
मोहल्ले मे कानाफूसी शुरू हो गई।
लड़की ज्यादा बाहर क्यो दिख रही है?
लड़का उसके घर के सामने क्यों खड़ा था?
समाज को कहानी नही चाहिए होती।
उसे सिर्फ शक चाहिए होता है।
लड़की के घर मे दबाव बढ़ने लगा।
हमारी इज्जत है।
लोग क्या कहेंगे?
लड़के के घर मे भी सवाल उठे –
अभी करियर बनाओ।
इन सब मे मत पड़ो।
दोनो चुप हो गए।
दूरिया जो करीब ले आई
उन्होने बात करना कम कर दिया।
मिलना बंद कर दिया।
पर क्या दिल को रोका जा सकता है?
एक दिन लड़की की शादी की शादी की बात पक्की कर दी गईं
घर मे खुशियां थी, पर उसके चेहरे पर नही।
लडके को खबर मिली।
उसने पहली बार महसूस किया कि
शायद उसने कभी अपने दिल की बात कही ही नही।
उस रात उसने खुद से पूछा –
क्या मैं डर गया था?
या समाज की आवाज मेरे दिल से ऊंची थी?
पहली बार सच फैसला
अगले दिन उसने लड़की से मिलने की हिम्मत की।
कोई बड़े-बड़े वादे नही किए।
बस इतना कहा –
मैं तुम्हे खोना नही चाहती।
अगर तुम्हे लगता है कि
कि ये रिश्ता सिर्फ मोहल्ले की कहानी नही है,
तो इस बार हम समाज से नही, खुद से डरना बंद करेंगे।
लड़की की आंखो मे आंसू थें।
वो पहली बार बोली –
‘‘मुझे डर हमेशा समाज को नही था….
मुझे डर था कि कहीं तुम साथ न छोड़ दो।‘‘
उस वाक्य ने लडत्रके को अंदर तक हिला दिया।
उसे समझ आ गया कि
प्यार मे सबसे बड़ा डर दुनिया नही, अविश्वास होता है।
उसने बिना सोचे उसका हाथ थाम लिया।
न कोई फिल्मी डायलॉग।
न कोई कसम।
बस एक सच्चा सा वादा –
‘‘अब अगर डरेंगे… तो साथ डरेंगे।
और अगर लड़ेगे… तो साथ लड़ेगे।‘‘
जब सच घर पहुंचा
अगले ही दिन दोनो ने तय किया कि
छुपकर नही, खुलकर बात करेंगे।
लड़की ने पहली बार अपने पिता से कहा-
मैने कोई गलती नही की है।
मैं बस किसी को पसंद करती हू…और वो मेरी इज्जत करता है।
घर मे सन्नाटा छा गया।
मां की आंखो मे चिंता थी।
पिता के चेहरे पर गुस्सा।
ये सब पढ़ाई के लिए भेजा था?
लोग क्या कहेंगे?
वही पुराना सवाल।
उधर लड़के के घर मे भी माहौल कुछ अलग नही था।
अभी नौकरी पक्की नही हुई…
जिम्मेदारिया समझो।
पर इस बार फर्क था।
इस बार दोनो चुप नही थे।
रिश्ते की असली परीक्षा
प्यार सिर्फ साथ घूमने का नाम नही होता।
प्यार तब साबित होता है,
जब आप सामने खड़े होकर अपने फैसले की जिम्मेदारी लेते है।
लड़के ने लड़के पिता से मिलने का फैसला किया।
सीधे, सादगी से।
‘‘अंकल मै आपकी बेटी से शादी करना चाहता हूं।
अभी मेरे पास कोई बड़ा घर नही है।
पर इज्ज्त और इरादा दोनो पक्का है।‘‘
ये शब्द दिखावे के नही थे, उसमे सच्चाई थी।
पिता पहली बार शांत हुए।
उन्होने पूछा –
‘‘अगर कल हालात बदल गए तो ?‘‘
लड़के ने बिना झिझक जवाब दिया-
‘‘तो भी मै साथ नही छोड़ूंगा।
क्योकि मै रिश्ता निभाने के लिए तैयार हू साबित करने के लिए नहीं।‘‘
समय ने क्या फैसला लिया?
शादी तुरंत नहीं हुई।
छः महीने का समय दिया गया।
शर्त साफ थी –
लड़का अपने करियर को स्थिर करे,
और दोनो साबित करे कि ये जिद नही, समझदारी है।
इन छः महीनो मे उन्होने दूरी बनाए रखी।
कम बात की, ज्यादा मेहनत की।
लड़का दिन रात नौकरी के लिए तैयारी करता रहा।
लड़की ने घर के जिम्मेदारियो के साथ-साथ छोटा सा ऑनलाइन काम शुरू किया।
उन्होने एक-दूसरे को सपोर्ट किया,
पर अपनी पहचान भी बनाई।
प्यार जो सम्मान मे बदल गया
धीरे-धीरे घरवालो का नजरिया बदलने लगा।
क्योकि उन्होने देखा –
ये रिश्ता छुप – छुपकर मिलने वाला नही था।
ये रिश्ता जिम्मेदारी से भरा था।
छः महीने बाद जब लड़के को अच्छी नौकरी मिली,
तो लड़की के पिता ने खुद कहा –
‘‘अगर तुम दोनो ने इतना इंतजार किया है,
तो शायद तुम्हारा फैसला सही है।‘‘
उस दिन पहली बार लड़की खुलकर मुस्कुराई।
लड़के ने महसूस किया कि
सच्चा प्यार कभी शोर नही करता,
वो सिर्फ वक्त के साथ मजबूत होता है।
बिना दिखावे की शादी
उनकी शादी सादगी से हुई।
कोई बड़ी बारात नही।
कोई दिखावा नही।
पर उस दिन मोहल्ले मे एक बदलाव था।
लोग बाते कर रहे थे,
पर इस बार अंदाज अलग था।
समाज बदला या नही,
ये कहना मुश्किल है।
पर एक बात साफ थी –
उन्होने खुद को नही बदला।
प्यार से बड़ी ताकत विश्वास है।
समाज की आवाज हमेशा ऊंची होगी।
दिल की आवाज सच्ची हो तो रास्ता मिल ही जाता है।
रिश्ता छुपाने से कमजोर होता है,
जिम्मेदारी से निभाने से मजबूत।
अगर आपकी जिंदगी मे भी कोई ऐसा रिश्ता है
जिसे आप सिर्फ समाज के डर से छुपा रहे है।
तो खुद से एक सवाल पूछिए –
क्या डर की वजह से दिल खो रहा है?
आपसे एक सवाल ?
- क्या आपने कभी किसी को सिर्फ इसलिए खो दिया क्योकि आप बोल नही पाए?
- अगर दोबारा मौका मिले तो आप हिम्मत करेंगे ?
- क्या प्यार को समाज से लड़ना चाहिए, या फिर पहले खुद को साबित करना चाहिए?
- क्या कभी आपने दिल की बात सिर्फ समाज के डर से रोकी है ?
- समाज बदलता है अगर आप खड़े होकर सही फैसला लेते है?
अपनी राय जरूर बताइए।
आपकी कहानी किसी और के लिए हिम्मत बन सकती है।
सच्चा रिश्ता वही है जहां दो लोग एक-दूसरे को स्वीकार करते है कमियो सहित।
उनकी मोहब्बत अनकही थी…..
पर अधूरी नही।
क्योंकि असली प्यार शब्दो से नही,
साहस और जिम्मेदारी से पूरा होता है।
अगर आपको ये कहानी दिल से जुड़ी लगी हो,
तो जरूर बताइए –
क्या आज के समय मे भी ऐसा प्यार संभव है?
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