आरव की जिंदगी
नोएडा का रहने वाला आरव एक मिडिल क्लास फैमिली से था। फैमिली में उसके पापा(रवि), मम्मी (रीता) और छोटी बहन (निधि) थी। मम्मी हाऊस वाइफ और पापा एक कंपनी में मेनेजर थे।
आरव बचपन से ही कुछ बड़ा करने की सोचता था। वो हमेशा बंद कमरे में अपने आप से ही कुछ न कुछ अपने सपने के बारे में कहते रहता था। उसके को 12वीं की परीक्षा चल रही थी। वो हमेशा अपनी मम्मी से कहता था! मैं कुछ ऐसा करूंगा मम्मी जिससे पापा हमेशा मुझपे गर्व करेंगे। उसकी मम्मी भी उससे कहती थी! हां बेटा तेरा सपना जरूर पूरा होगा। पापा और मुझे तुझपे हमेशा से ही गर्व है।
आखिरकार वो दिन आ ही गया, जिसका आरव को बेसब्री से इंतजार था । अपनी मेहनत के फलस्वरुप वह कक्षा में पहले नंबर पर आया। उस दिन मानो आरव के खुशी का ठिकाना नहीं था। उसके पैर जमीन पर थम ही नहीं रहे थे।उसकी खुशी को देखकर उसकी फैमिली भी बहुत खुश थी। आरव अपने आगे की पढ़ाई को लेकर विचार कर रहा था। क्या उसकी खुशी हमेशा रहने वाली थी ? या फिर उसके ख्वाब के सपने जो वो देखता था वो अधूरे ही रह जाऐंगे।
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अब आरव अपने सपने पूरे करने के लिये भविष्य की योजना बनाने में लग जाता है ।
लेकिन शायद समय को कुछ और ही मंजूर था । होली के ठिक एक रात पहले की बात है ।
हमेशा समय पर घर आ जाने वाले उसके पापा काफी लंबे इंतिजार के बाद भी घर नहीं पहुॅचे थे ।
रात के 9 बज चुके थे। उनका फोन भी बंद आ रहा था ।
आरव ने अपने पापा के ऑफिस कॉल किया तो पता चला कि वो तो शाम 07ः00 बजे से ही ऑफिस से निकल चुके हैं ।
आरव ने देर न करते हुए तुरंत ही बाईक लेकर अपने पापा की खोज में निकल पड़ा ।
रास्ते में जाते हुए उसे लोगों की भीड़ दिखाई दी । वह भीड़ के करीब पहुॅचा और जो देखा जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी ।
उसके पापा जमीन पर खून से लथपथ पड़े हुए थे । आरव का दिल अंदर तक कांप गया, आंखों में आंसू भर आये ।
वह भागा… अपने पापा को जमीन से उठाकर दूसरे हाथ से फोन लेकर एंबुलेंस को कॉल किया ।
लोागों की भीड़ तो मानो बस तमाशा देखने को ही इक्ट्ठा हुई थी ।
किसी ने उसके पापा को उठााना तो दूर की बात है एंबुलेंस को कॉल तक नहीं किया था ।
आरव ने दूसरा कॉल अपने दोस्त कोे किया और इस पूरी घटना की जानकारी दी।
हॉस्पिटल पहुॅचकर उसके पापा का ईलाज शुरु हुआ ।
इधर आरव का दोस्त राकेश भी उसकी मम्मी और छोटी बहन निधी को लेकर ऑफिस पहुॅच जाता है ।
राकेश ने अब तक आरव की मम्मी को इस हादसे के बारे में कुछ नहीं बताया था ।
परिवार की दुखद घड़ी
हॉस्पिटल में कदम रखते ही वो और ज्यादा घबरा गई ।
आरव को देखते ही घबराई हुई मॉ ने पूछा – ‘‘‘क्या हुआ आारव ? मुझे हॉस्पिटल लेकर क्यूॅ आये हो ।‘‘
तब आरव ने मॉ को शांत करते हुए पूरी घटना की जानकारी दी और अपने पापा के पास ले गया ।
मॉ की ऑखो से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे ।आरव ने बड़े उदास मन से कहा कि –
‘‘मॉ! अगर लोगो ने थोड़ी इंसानियत दिखाई होती और समय पर पापा को अस्पताल पहुॅचा दिया होता |
तो शायद इनकी हालत इतनी बुरी न हुई होती ।
थोड़ी देर में डॉ ने पूरी जॉच कर आरव को बताया कि उसके पापा कॉमा में चले गये हैं ।
वो कब तक ठीक हो पायेंगे ये कह पाना मुश्किल है । ये आरव के लिये सबसे बड़ा झटका था ।
अब सिर्फ अपने पापा के ईलाज का खर्च ही नहीं बल्की घर की पूरी जिम्मेदारी भी उसी के सर पर आ गई थी ।
अब घर की ऐसी हालत हो गई थी। जो आरव से देखी नहीं जा रही थी। घर में खाने के लिए कुछ नहीं था।
उसके पापा के ऐसे हालत होने के बाद उनके घर में कोई कमाने वाला नहीं था।
अब एक दिन शाम के समय आरव अपने कमरे में बैठा था। वहां उसका दोस्त राकेश उससे मिलने आता है।
अब राकेश उससे पूछता है! आरव अब तेरे सपने, तेरे पढ़ाई का आगे क्या होगा। तब आरव दुखी होकर राकेश को कहता है!
हां दोस्त मैं भी अपने कमरें में बैठा,
उन अधूरे ख्वाबों का हिसाब लिख रहा हूं जो मैंने बचपन से सोचा है और सोच रहा हूं
अगर मैंने जो पल सोचा था अगर वो पल अभी तक सच हो गए होते तो शायद मेरी और मेरे परिवार की जिंदगी अभी कुछ और होती।
अंतिम पंक्तियां- अब आगे क्या होगा ?
क्या आरव के पापा कोमा से निकल पाऐंगे ?
उसके और उसके परिवार की खुशियां फिर से वापस आ पाएगी ?
क्या आरव के बचपन के सपने को वो पूरा कर पाएगा ?
या फिर उसके ख्वाबों में अब नमी आ गई और क्या इस वक्त से वो निकल पाएगा ?
वो अपने परिवार को संभाल पाएगा या फिर अपने अधूरे ख्वाबों की नमी को सोचकर बंद कमरे में बैठा रहेगा ?
ये जानने के लिए पढ़िएगा कहानी का अगला भाग ?
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