रिया का संघर्ष की कहानी
आाज हम जानेंगे एक ऐसी महिला की कहानी। जो अपने शादी के कई सपने सजाए अपने ससुराल आई थी।
उसे क्या पता उसके लिए शादी सजा बन जाएगा।
रसोई से बर्तनों के गिरने की एक ज़ोरदार आवाज़ आई।
धूप से तपती दोपहर थी। आठ महीने की गर्भवती रिया,
दीवार का सहारा लिए हाँफ रही थी।
गर्मी और कमजोरी से उसका चेहरा पीला पड़ चुका था,
माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं।
तभी उसकी सास, सरला देवी, किसी तूफ़ान की तरह कमरे में दाखिल हुईं।
“मर गई क्या? कब से आवाज़ दे रही हूँ! यहाँ महारानी बनी खड़ी है और मेरे बेटे को ऑफिस के लिए देर हो रही है!”
उनकी आवाज़ में ताने और गुस्सा दोनों थे।
“पेट में बच्चा है तो क्या दुनिया तेरे लिए रुक जाएगी? हमारे ज़माने में तो औरतें बच्चे होने वाले दिन तक खेत में काम करती थीं!”
रिया काँपती हुई बोली, “माँ जी, बस थोड़ा चक्कर सा आ गया था, अभी बना देती हूँ रोटी।”
लेकिन सरला ने झल्लाते हुए कहा, “रहने दे ये सब नाटक! कामचोर कहीं की! चल, फटाफट हाथ चला!”
और उसने रिया की बाँह पकड़कर उसे रसोई की ओर धकेल दिया।
रिया की आँखों में आँसू थे, लेकिन वो कुछ नहीं बोली। उसके लिए चुप रहना ही अब आदत बन चुकी थी।
हर दिन एक नया ज़ुल्म
समय बीतता गया, और रिया की तबीयत बिगड़ती चली गई। डॉक्टर ने उसे आराम करने की सलाह दी थी,
लेकिन सरला देवी को इन बातों पर विश्वास नहीं था।
“डॉक्टर लोग तो बस बहाने बनाते हैं, पहले के ज़माने में ऐसा कुछ नहीं होता था,” वो अक्सर कहतीं।
रिया चाहकर भी आराम नहीं कर पाती।
सुबह से रात तक घर के सारे काम — झाड़ू, बर्तन, खाना, कपड़े — सब उसी के ज़िम्मे थे।
पति अमित दफ्तर से लौटता तो माँ की बातें सुनकर वही मान लेता।
“रिया, माँ जो कह रही हैं वो सही है, थोड़ी मेहनत करने से कोई मरता नहीं,” वो कहकर मोबाइल में खो जाता।
रिया मुस्कुराने की कोशिश करती, पर उसकी मुस्कान के पीछे दर्द और बेबसी छिपी रहती।
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वो रात जिसने सब बदल दिया
एक रात रिया को अचानक तेज़ दर्द हुआ। वो चिल्लाई, “माँ जी! अमित!”
लेकिन कोई नहीं उठा। सरला ने करवट बदलते हुए कहा, “नाटक बंद कर, सुबह हॉस्पिटल जाएंगे।”
रिया दर्द से तड़पती रही। सुबह जब उसे अस्पताल ले जाया गया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
डॉक्टर ने कहा, “आपको पहले ही लाना चाहिए था, बच्चा कमजोर है।”
वो शब्द रिया के कानों में हथौड़े की तरह गूंजे।
उसने अपनी गोद में उस नन्हें बच्चे को देखा — उसकी साँसें बहुत धीमी थीं। रिया का दिल टूट चुका था।
उस दिन के बाद रिया ने तय किया कि अब वो चुप नहीं रहेगी।
डिस्चार्ज होने के बाद उसने मायके फोन किया।
पिता ने कहा, “बेटी, अब और मत सहो, तू और तेरे बच्चे की ज़िंदगी सबसे कीमती है।”
रिया ने धीरे-धीरे खुद को संभाला। उसने सिलाई सीखनी शुरू की, घर से काम करने लगी।
अमित को भी एहसास हुआ कि उसकी चुप्पी ने रिया को कितना तोड़ा था।
धीरे-धीरे उसने अपनी माँ को समझाया और रिया के साथ खड़ा हुआ।
आज रिया वही रसोई में खड़ी है, लेकिन अब डर नहीं है। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास है।
सास भी अब वही रसोई में आती हैं, पर इस बार कहती हैं —
“बहू, आज तू आराम कर ले, मैं रोटी बना लूँगी।”
हर औरत सिर्फ बहू नहीं होती, वो भी एक इंसान है — एक बेटी, एक पत्नी और सबसे बढ़कर एक माँ।
कभी-कभी चुप रहना भी गुनाह होता है, क्योंकि ज़ुल्म तभी बढ़ता है जब हम सहते रहते हैं।
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